देहरादून : उत्तराखंड में सरकारी नौकरी की आस लगाए बैठे युवाओं के लिए यह खबर बेहद अहम है. राज्य सरकार ने विभागों में चल रहे ‘शॉर्टकट’ कल्चर पर करारा प्रहार किया है.
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अब कोई भी सरकारी विभाग स्वीकृत स्थाई पदों को भरने के लिए सीधे संविदा या आउटसोर्सिंग का आसान रास्ता नहीं चुन सकेगा. कार्मिक एवं सतर्कता विभाग ने दो टूक कह दिया है कि पहले नियमित भर्ती की प्रक्रिया शुरू करें, तभी कामचलाऊ व्यवस्था पर विचार होगा.
मनमानी पर अपर सचिव का सख्त पहरा
शासन ने विभागीय पदों को भरने के तरीकों को लेकर कड़ा रुख अपनाया है. अपर सचिव गिरधारी सिंह रावत ने इस संबंध में एक विस्तृत शासनादेश जारी किया है. यह आदेश प्रदेश के सभी प्रमुख सचिवों, विभागाध्यक्षों, मंडलायुक्तों और जिलाधिकारियों की मेज पर पहुंच चुका है.
आदेश का लब्बोलुआब साफ है—विभागीय ढांचे में जो पद नियमित (Permanent) हैं, उन पर नियुक्ति सिर्फ तय चयन प्रक्रिया से ही होगी. अफसरों को निर्देश दिए गए हैं कि वे 25 अप्रैल 2025 को जारी पुराने आदेशों का भी कड़ाई से पालन सुनिश्चित करें.
क्यों पड़ी इस सख्ती की जरूरत?
नियम स्पष्ट होने के बावजूद धरातल पर अधिकारी मनमानी कर रहे थे. शासन की नोटिस में आया कि कई विभाग स्वीकृत नियमित पदों पर भर्ती प्रक्रिया शुरू करने से कतरा रहे हैं. ये विभाग चयन आयोग को अधियाचन (Requisition) भेजने के बजाय सीधे संविदा या आउटसोर्सिंग के जरिए पद भरने का प्रस्ताव शासन को भेज रहे थे.
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इसे नियमों का खुला उल्लंघन मानते हुए शासन ने गहरी नाराजगी जताई है. सरकार का मानना है कि इससे नियमित भर्ती प्रक्रिया बाधित होती है और योग्य युवाओं का हक मारा जाता है.
अब मुख्य सचिव की कमेटी ही लेगी फैसला
शासन ने नियमित भर्ती में आने वाली व्यावहारिक दिक्कतों को दूर करने के लिए मुख्य सचिव की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई है. लेकिन, अब यह कमेटी भी सख्त शर्तों पर काम करेगी.
यह समिति केवल उन्हीं प्रस्तावों पर विचार करेगी, जिन विभागों ने संबंधित पदों के लिए भर्ती एजेंसी (जैसे UKPSC या UKSSSC) को अधियाचन भेज दिया है. यानी, जब तक नियमित चयन की प्रक्रिया गतिमान नहीं होगी, तब तक उस पद पर संविदा या अस्थायी कर्मचारी रखने की फाइल आगे नहीं बढ़ेगी.
प्राथमिकता पर करनी होगी नियमित भर्ती
जारी शासनादेश में साफ लिखा है कि रिक्त पदों को भरना विभागों की प्राथमिकता होनी चाहिए. जब तक किसी पद पर नियमित चयन पूरा नहीं हो जाता, केवल तभी तक वैकल्पिक व्यवस्था मान्य होगी, वह भी शर्त के साथ. सरकार का तर्क है कि नियमित भर्ती प्रक्रिया से ही प्रशासनिक पारदर्शिता आ सकती है.
तदर्थ या संविदा व्यवस्था से न सिर्फ काम प्रभावित होता है, बल्कि भविष्य में कई तरह की कानूनी और प्रशासनिक पेचीदगियां भी खड़ी हो जाती हैं. आदेश में यह चेतावनी भी दी गई है कि अगर अब भी नियमों की अनदेखी हुई, तो संबंधित विभाग के अधिकारियों की जिम्मेदारी तय की जाएगी.













