ताज़ा समाचार देश विदेश क्राइम बिज़नेस खेल मनोरंजन ऑटो गैजेट्स धर्म राशिफल आज का पंचांग
हेल्थ लाइफस्टाइल करियर ट्रेंडिंग

Maritime Toll Dispute : होर्मुज और लाल सागर में टोल की जंग, जानिए क्या कहते हैं अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून

ईरान द्वारा होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों पर सुरक्षा शुल्क लगाने की घोषणा और हूतियों द्वारा बाब अल-मंडेब में टोल वसूलने की तैयारी ने वैश्विक समुद्री व्यापार में नई तनातनी पैदा कर दी है। संयुक्त राष्ट्र के UNCLOS नियमों के तहत अंतरराष्ट्रीय जलमार्गों पर मनमाना टोल वसूलना प्रतिबंधित है, जिससे पश्चिमी देशों और तटीय ताकतों के बीच टकराव गहराता जा रहा है।

Published On: August 3, 2026 1:22 PM
Maritime Toll Dispute : होर्मुज और लाल सागर में टोल की जंग, जानिए क्या कहते हैं अंतरराष्ट्रीय समुद्री कानून

HIGHLIGHTS

  • होर्मुज में ईरान ने सुरक्षा सेवाओं के नाम पर शुल्क मांगा।
  • हूती समूह ने बाब अल-मंडेब में टोल शेड्यूल बनाने का फैसला किया।
  • UNCLOS कानून के तहत ट्रांजिट पैसेज पर मनमाना टैक्स प्रतिबंधित है।
  • 12 नॉटिकल मील तक ही तटीय देशों की संप्रभुता मानी जाती है।

नई दिल्ली, 03 अगस्त, 2026 (दून हॉराइज़न)।

Maritime Toll Dispute : मध्य पूर्व के संकरे समुद्री रास्तों पर एक नई आर्थिक और सामरिक जंग छिड़ चुकी है। होर्मुज की खाड़ी से लेकर लाल सागर के मुहाने पर स्थित बाब अल-मंडेब तक, जहाजों से पैसे वसूलने की तैयारी की जा रही है। ईरान ने स्पष्ट कर दिया है कि वह होर्मुज जलडमरूमध्य से गुजरने वाले कमर्शियल टैंकरों से नेविगेशन और सुरक्षा सेवाओं के बदले में फीस लेगा।

दूसरी तरफ यमन के ईरान समर्थित हूती लड़ाकों ने भी बाब अल-मंडेब से होकर गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय जहाजों पर टोल शेड्यूल लागू करने का विचार शुरू कर दिया है। इन दोनों जलमार्गों से दुनिया का एक-चौथाई तेल और करीब 15 प्रतिशत समुद्री व्यापार गुजरता है। इस कदम से अमेरिका और उसके पश्चिमी सहयोगी देशों के साथ तेहरान की तनातनी चरम पर पहुंच गई है।

संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट बताती है कि समुद्र के रास्तों पर अपना हक जताने का विवाद आज का नहीं है। इतिहास गवाह है कि जब से इंसानों ने पानी पर नाव उतारी है, तब से इन जलमार्गों पर नियंत्रण का झगड़ा चल रहा है। 1493 में पोप अलेक्जेंडर VI ने ‘पोप बुल इंटर कैटेरा’ आदेश के जरिए अटलांटिक महासागर में एक काल्पनिक रेखा खींचकर पूरे महासागरों को स्पेन और पुर्तगाल के बीच बांट दिया था।

1494 में टॉर्डेसिलस की संधि के बाद यह रेखा और पश्चिम की तरफ खिसका दी गई थी। इस बंटवारे के तहत प्रशांत महासागर स्पेन को मिला और हिंद महासागर पुर्तगाल के पास चला गया। हालांकि इस कागजी समझौते के बावजूद समुद्री रास्तों पर कब्जों और वर्चस्व की लड़ाई सदियों तक कभी खत्म नहीं हो सकी।

मौजूदा दौर में अमेरिका और इजरायल के साथ जारी सैन्य तनाव के बीच ईरान ने बार-बार होर्मुज पर अपना पूर्ण मालिकाना हक जताया है। तेहरान ने बिना इजाजत अपने समुद्री क्षेत्र से गुजरने वाले कई जहाजों पर मिसाइल और ड्रोन से हमले भी किए हैं। ईरान का तर्क है कि वह नेविगेशन, सुरक्षा और पर्यावरण सुरक्षा सेवाएं दे रहा है, इसलिए जहाजों को इसका भुगतान करना ही पड़ेगा।

खाड़ी देशों का बड़ा व्यापार इसी जलमार्ग पर टिका हुआ है, इसलिए पड़ोसी देश ओमान ने शांति की एक नई योजना पेश की है। ओमान ने ईरान के सामने प्रस्ताव रखा है कि होर्मुज के प्रबंधन के लिए एक स्वैच्छिक फंड बनाया जाए, जिसमें जहाज अपनी मर्जी से योगदान दें। इस योजना को कई पश्चिम एशियाई देशों का मौन समर्थन हासिल है ताकि व्यापार बिना किसी रुकावट के चलता रहे।

अमेरिका ने ईरान के इस टोल प्लान को सिरे से खारिज कर दिया है। अमेरिकी प्रशासनिक अधिकारियों का कहना है कि वाशिंगटन किसी भी सूरत में ईरान को अंतरराष्ट्रीय जलमार्ग पर टोल लगाने या नाकेबंदी करने की इजाजत नहीं देगा। अमेरिका का रुख साफ है कि यह रास्ता अंतरराष्ट्रीय नेविगेशन के लिए पूरी तरह मुफ़्त और खुला रहना चाहिए।

दूसरी तरफ, लाल सागर के प्रवेश द्वार बाब अल-मंडेब पर काबिज हूती समूहों ने भी जहाजों की आवाजाही पर टोल लगाने का अपना खाका तैयार करना शुरू कर दिया है। समुद्री मामलों के विशेषज्ञों का कहना है कि हूती जैसे गैर-राज्य समर्थित समूहों के पास अंतरराष्ट्रीय कानूनों के तहत ऐसा कोई भी शुल्क वसूलने का कानूनी अधिकार नहीं है।

इतिहास पर नजर डालें तो समुद्री सीमाओं को तय करने के लिए 18वीं सदी में ‘तोप-गोली का नियम’ (Cannon-shot rule) लागू किया गया था। इसके तहत तटीय देश अपने तट से उतनी दूरी तक समुद्र पर संप्रभुता का दावा कर सकते थे, जितनी दूर तक उनके किनारे पर लगी तोपें गोला दाग सकती थीं। उस समय यह दूरी 1 मरीन लीग यानी लगभग 3 नॉटिकल मील (5.6 किलोमीटर) मानी जाती थी।

3 नॉटिकल मील की यह पारंपरिक सीमा द्वितीय विश्व युद्ध तक दुनिया भर में मान्य रही। 1945 में अमेरिकी राष्ट्रपति हैरी एस ट्रूमैन ने अपने महाद्वीपीय शेल्फ के प्राकृतिक संसाधनों पर एकतरफा अधिकार का ऐलान कर दिया, जिसके बाद दुनिया के बाकी देशों में भी अपनी समुद्री सीमाएं बढ़ाने की होड़ मच गई।

1946 में अर्जेंटीना और 1947 में चिली व पेरू ने 200 नॉटिकल मील के क्षेत्र पर अपना दावा ठोक दिया। वहीं मिस्र, सऊदी अरब, इथियोपिया और लीबिया जैसे देशों ने अपनी क्षेत्रीय सीमा को बढ़ाकर 12 नॉटिकल मील (लगभग 22 किलोमीटर) घोषित कर दिया। इंडोनेशिया ने 1957 में अपने 17 हजार द्वीपों के चारों तरफ सीधी बेसलाइन खींचकर अंदरूनी पानी पर अपना अधिकार जता दिया था।

1960 के दशक में समुद्र के भीतर तेल निकालने का काम तेज हो गया और परमाणु पनडुब्बियों की तैनाती बढ़ने लगी। 1 नवंबर 1967 को संयुक्त राष्ट्र में माल्टा के राजदूत अरविद पार्डो ने महासभा को चेतावनी दी कि बिना स्पष्ट नियमों के समुद्र में बड़ा सैन्य टकराव हो सकता है। उनके इसी ऐतिहासिक भाषण के बाद UNCLOS (United Nations Convention on the Law of the Sea) पर लंबी चर्चा शुरू हुई।

दिसंबर 1982 में जमैका के मोंटेगो बे में UNCLOS संधि को 130 देशों के समर्थन से पारित किया गया। हालांकि, सीबेड माइनिंग के कड़े नियमों के कारण अमेरिका ने इस पर दस्तखत नहीं किए थे। ईरान ने 1982 में इस पर हस्ताक्षर जरूर किए, लेकिन अपनी संसद से इसकी कभी पुष्टि नहीं कराई।

UNCLOS ने अंतरराष्ट्रीय नियम बनाते हुए तटीय देशों के क्षेत्रीय समुद्र की सीमा 12 नॉटिकल मील तय की। लेकिन इस 12 मील के नियम ने दुनिया की बड़ी नौसेनाओं के सामने एक नया संकट खड़ा कर दिया। दुनिया के करीब 100 सबसे महत्वपूर्ण संकरे जलमार्ग जैसे जिब्राल्टर, होर्मुज, बाब अल-मंडेब और मलक्का पूरी तरह से तटीय देशों के क्षेत्रीय जल में आ गए।

अगर तटीय देश इन रास्तों को बंद कर देते तो वैश्विक व्यापार ठप हो जाता। इसीलिए UNCLOS संधि के अनुच्छेद 37 से 44 के तहत ‘ट्रांजिट पैसेज’ (Transit Passage) का एक नया अंतरराष्ट्रीय कानून बनाया गया। इसके तहत जहाजों, सैन्य विमानों और पनडुब्बियों को बिना रोक-टोक के लगातार और तेजी से इन जलमार्गों से गुजरने का पूर्ण अधिकार दिया गया।

UNCLOS नियमों के तहत तटीय देश जहाजों से सिर्फ गुजरने का टोल टैक्स नहीं वसूल सकते। ब्लूमबर्ग की विश्लेषण रिपोर्ट के मुताबिक, तटीय देश सिर्फ उन मामलों में फीस ले सकते हैं जब वे जहाज को कोई खास सेवा प्रदान कर रहे हों, जैसे पायलट गाइड या टग बोट की मदद।

दुनिया भर के प्रमुख जलमार्ग अलग-अलग व्यवस्थाओं के तहत संचालित होते हैं:

मलक्का जलडमरूमध्य को इंडोनेशिया, मलेशिया और सिंगापुर मिलकर संभालते हैं। 800 किलोमीटर लंबे इस रास्ते से हर साल 2.4 ट्रिलियन डॉलर का व्यापार होता है। यहां कोई ट्रांजिट टोल नहीं लिया जाता, बल्कि एक स्वैच्छिक फंड के जरिए लाइटहाउस और नेविगेशन बोया का रखरखाव किया जाता है। 2025 की तीसरी तिमाही के अंत तक इस फंड में 4.11 मिलियन डॉलर का बैलेंस बचा था।

इंडोनेशिया के राष्ट्रपति प्रबोवो सुबियांटो ने हाल ही में सिंगापुर के प्रधानमंत्री लॉरेंस वोंग से मुलाकात के बाद साफ किया कि मलक्का जलडमरूमध्य UNCLOS नियमों के तहत सभी जहाजों के लिए पूरी तरह मुफ़्त और खुला रहेगा। इंडोनेशिया ने पहले टोल लगाने पर विचार किया था, लेकिन बाद में अपने कदम पीछे खींच लिए।

स्पेन और मोरक्को के बीच स्थित जिब्राल्टर जलडमरूमध्य से हर साल 1 लाख से ज्यादा व्यापारिक जहाज गुजरते हैं। 13 किलोमीटर संकरे इस अंतरराष्ट्रीय रास्ते पर जहाजों से कोई भी पारगमन शुल्क या टैक्स नहीं लिया जाता है।

ताइवान जलडमरूमध्य से हर साल 2.45 ट्रिलियन डॉलर का कारोबार होता है। चीन इस रास्ते को अपना अंदरूनी जल क्षेत्र मानता है, लेकिन अमेरिका और अंतरराष्ट्रीय समुदाय इसे खुला जलमार्ग मानते हैं और बिना शुल्क दिए यहां से वाणिज्यिक जहाज बेरोकटोक गुजरते हैं।

तुर्की के बोस्फोरस और डार्डानेल्स जलमार्ग 1936 की मॉन्ट्रो संधि के तहत संचालित होते हैं। तुर्की यहां से गुजरने वाले जहाजों से पायलट, लाइटहाउस और साल्वेज सेवाओं के बदले फीस लेता है, जिसकी गणना गोल्ड फ्रैंक में की जाती है। 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के दौरान तुर्की ने इसी संधि का इस्तेमाल करके बाहरी युद्धपोतों के प्रवेश पर रोक लगा दी थी।

डेनमार्क के लिटिल बेल्ट और ओरेसंड जलमार्ग 1857 की कोपेनहेगन संधि से संचालित होते हैं, जिसने डेनमार्क के पुराने टोल टैक्स को खत्म कर दिया था। अर्जेंटीना और चिली के बीच मैगलन जलडमरूमध्य 1881 और 1984 की शांति संधियों के तहत सभी देशों के जहाजों के लिए मुफ़्त और तटस्थ घोषित है।

मिस्र की स्वेज नहर (193 किलोमीटर) और पनामा की पनामा नहर (80 किलोमीटर) UNCLOS के दायरे में नहीं आती हैं। ये दोनों नहरें कृत्रिम और संप्रभु अवसंरचना हैं। स्वेज नहर प्राधिकरण एक लदे हुए बड़े टैंकर से एकतरफा सफर के लिए औसतन 3.80 लाख डॉलर वसूलता है। पनामा नहर से गुजरने वाले मध्यम दूरी के टैंकरों को 3.50 लाख से 4.00 लाख डॉलर तक का भुगतान करना पड़ता है।

ईरान का कहना है कि उसने UNCLOS की पुष्टि नहीं की है, इसलिए वह इसके नियमों को मानने के लिए बाध्य नहीं है। हालांकि, अंतरराष्ट्रीय कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रांजिट पैसेज के नियम प्रथागत अंतरराष्ट्रीय कानून (Customary International Law) का हिस्सा हैं, जो संधि पर दस्तखत न करने वाले देशों पर भी समान रूप से लागू होते हैं।

Advertisement

Ansh Goyal

अंश गोयल 'दून हॉराइज़न' में अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ (International Desk) की जिम्मेदारी निभा रहे हैं। वैश्विक राजनीति, युद्ध के हालात, कूटनीति (Diplomacy) और ग्लोबल इकॉनमी पर उनकी गहरी पकड़ है। अंश का मुख्य फोकस अमेरिका, रूस, मध्य पूर्व और पड़ोसी देशों की हलचल का भारतीय दृष्टिकोण से सटीक विश्लेषण करना है। विदेशी मंचों पर भारत के बढ़ते दबदबे और वैश्विक नीतियों का आम आदमी पर पड़ने वाले प्रभाव को वे बेहद सरल हिंदी में समझाते हैं। उनकी डीप-रिसर्च वाली रिपोर्टिंग पाठकों को दुनिया भर की विश्वसनीय खबरें प्रदान करती है।

Leave a Comment