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Murti Nirmaan : मूर्ति बनाने के लिए हर लकड़ी नहीं होती पवित्र, जानिए क्या कहते हैं शास्त्र

हिंदू धर्मशास्त्रों में मूर्ति निर्माण के लिए लकड़ी के चयन को लेकर बेहद सख्त नियम बताए गए हैं. आम, नीम और बबूल जैसे पेड़ों को अलग-अलग कारणों से प्रतिमा निर्माण के लिए वर्जित माना गया है, जबकि सागवान और चंदन की लकड़ी को सबसे पवित्र और टिकाऊ बताया गया है.

Published on: February 5, 2026 7:02 AM
Murti Nirmaan
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HIGHLIGHTS

  • बबूल और श्मशान की लकड़ी: बबूल को तामसिक और श्मशान के पास उगने वाले पेड़ों को नकारात्मक ऊर्जा का स्रोत माना गया है.
  • आम और पलाश: पूजा में पवित्र होने के बावजूद कम टिकाऊपन (Durability) के कारण इनसे मूर्ति नहीं बनती.
  • शमी और बेल: इनके पत्ते देवताओं को चढ़ते हैं, लेकिन लकड़ी मूर्ति निर्माण के लिए शास्त्रों में वर्जित है.
  • शुभ लकड़ियां: सागवान, चंदन और सफेद आक की लकड़ी को मूर्ति बनाने के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है.

Murti Nirmaan : हिंदू धर्म में देवी-देवताओं की प्रतिमा बनाना महज कलाकारी नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक विज्ञान है. शास्त्रों और पुराणों में स्पष्ट निर्देश हैं कि किस धातु या लकड़ी से बनी मूर्ति में प्राण-प्रतिष्ठा फलदायी होती है.

अक्सर लोग मूर्ति की सुंदरता देखते हैं, लेकिन मूर्तिकार लकड़ी के चयन में बेहद सावधानी बरतते हैं. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, हर पेड़ की लकड़ी पूजनीय प्रतिमा बनने के योग्य नहीं होती. गलत लकड़ी का चयन पूजा के प्रभाव को निष्फल कर सकता है.

श्मशान और कमजोर पेड़ों से दूरी जरूरी

मूर्ति निर्माण के लिए पेड़ों का चयन करते समय उनकी स्थिति और स्थान का बहुत महत्व है.

शास्त्र कहते हैं कि जिन पेड़ों पर पक्षियों का बसेरा हो, जो श्मशान के आसपास उगे हों या जिनके नीचे दीमक और सांपों का वास हो, उनकी लकड़ी कभी इस्तेमाल नहीं करनी चाहिए.

इसके अलावा, दूध देने वाले पेड़, पूरी तरह सूखे हुए वृक्ष या कमजोर टहनियों वाले पेड़ों की लकड़ी को भी मूर्ति बनाने के लिए अशुभ माना जाता है. ऐसी लकड़ियों में नकारात्मक ऊर्जा का वास माना गया है.

बबूल और नीम: क्यों हैं वर्जित?

बबूल की लकड़ी भले ही मजबूत होती है, लेकिन धार्मिक दृष्टि से इसे मूर्ति के लिए अशुद्ध माना गया है. इसे ‘तामसिक’ श्रेणी में रखा गया है, जिससे घर में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह नहीं हो पाता.

वहीं, नीम का पेड़ औषधीय गुणों से भरपूर और पवित्र होता है, लेकिन इस स्रोत के अनुसार इसकी लकड़ी को मूर्ति निर्माण के मापदंडों पर खरा नहीं माना जाता. मान्यता है कि नीम की लकड़ी प्रतिमा के लिए उपयुक्त नहीं बैठती.

हैरानी की बात यह है कि जिन पेड़ों के पत्ते और लकड़ी हवन-पूजन में अनिवार्य हैं, उनसे भी भगवान की मूर्ति नहीं बनती.

आम: आम की लकड़ी हवन के लिए श्रेष्ठ है, लेकिन मूर्ति बनाने के लिए इसे वर्जित माना गया है क्योंकि यह लंबे समय तक टिक नहीं पाती.

पलाश (ढाक): इसके बिना यज्ञ अधूरे हैं, लेकिन इसकी लकड़ी जल्दी टूट-फूट जाती है, इसलिए यह मूर्ति के लिए सही नहीं है.

शमी और बेल: शमी के पत्ते विजय का प्रतीक हैं और बेलपत्र शिव को प्रिय हैं. बावजूद इसके, इनकी लकड़ियों का प्रयोग मूर्ति बनाने में नहीं किया जाता. शास्त्र इन्हें केवल पत्र-पुष्प चढ़ाने तक ही सीमित रखते हैं.

इन लकड़ियों में होता है देव वास

शास्त्रों ने मूर्ति निर्माण के लिए कुछ विशेष लकड़ियों को ही स्वीकृति दी है. इसमें सागवान (Teak), चंदन और सफेद आक मुख्य हैं. सागवान की लकड़ी अपनी मजबूती और लंबे जीवन के लिए जानी जाती है, जिससे मूर्ति खंडित होने का डर नहीं रहता.

वहीं, चंदन की लकड़ी को सबसे पवित्र माना गया है, विशेषकर भगवान विष्णु और श्रीकृष्ण की मूर्तियों के लिए यह सर्वोत्तम है. सफेद आक की लकड़ी भी धार्मिक नजरिए से अत्यंत शुभ और फलदायी मानी गई है.

Ganga

गंगा एक अनुभवी धार्मिक समाचार लेखिका हैं, जिन्हें इस क्षेत्र में 3 वर्षों से अधिक का लेखन अनुभव प्राप्त है। धर्म, संस्कृति और आस्था से जुड़े विषयों पर उनकी गहरी समझ है। वे सटीक, तथ्यपूर्ण और संवेदनशील लेखन शैली के लिए जानी जाती हैं। गंगा का उद्देश्य पाठकों तक धार्मिक घटनाओं, परंपराओं और समसामयिक समाचारों को सरल और विश्वसनीय रूप में पहुँचाना है। 📧 Email: editor.dhnn@gmail.com

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