Shani Dev Puja : हिन्दू धर्म में शनिवार का दिन न्याय के देवता शनि और संकटमोचन हनुमान जी को समर्पित है। मंदिरों में भक्त शनिदेव की मूर्ति पर सरसों का तेल और काले तिल अर्पित करते हैं।
शनिदेव को काला रंग अत्यंत प्रिय है, इसलिए काली वस्तुओं का दान और अर्पण शुभ माना जाता है। लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि इन चीजों को चढ़ाने की परंपरा कैसे शुरू हुई और इसके पीछे कौन सी प्राचीन घटनाएं जिम्मेदार हैं।
हनुमान जी और सरसों के तेल का संबंध
पौराणिक कथाओं के मुताबिक, एक बार हनुमान जी और शनिदेव के बीच युद्ध छिड़ गया था। इस भीषण युद्ध में शनिदेव को काफी चोटें आईं और उनका शरीर दर्द से कराहने लगा।
उनकी पीड़ा देखकर हनुमान जी ने उनके घावों पर सरसों का तेल लगाया। तेल लगाने से शनिदेव का दर्द कम हो गया और उन्हें तुरंत राहत मिली।
दर्द से मुक्ति मिलते ही शनिदेव ने वरदान दिया कि जो भी भक्त शनिवार को मुझे श्रद्धापूर्वक सरसों का तेल चढ़ाएगा, उसके सारे कष्ट दूर हो जाएंगे। तभी से यह परंपरा अनवरत चली आ रही है।
लंका में जब रावण ने किया था कैद
एक अन्य प्रचलित कथा रावण और लंका से जुड़ी है। जब रावण ने सभी नवग्रहों को बंदी बना लिया था, तब हनुमान जी माता सीता की खोज में लंका पहुंचे।
वहां उन्होंने शनिदेव को कष्ट में और उल्टा लटका हुआ देखा। हनुमान जी ने उन्हें बंधन मुक्त कराया और उनके दर्द को कम करने के लिए सरसों का तेल लगाया।
इस सेवा से प्रसन्न होकर शनिदेव ने वचन दिया कि जो भी व्यक्ति शनिवार को हनुमान जी की पूजा करेगा, उसे शनि की दशा कभी नहीं सताएगी। साथ ही तेल चढ़ाने वाले की सारी बाधाएं नष्ट हो जाएंगी।
काले तिल के पीछे सूर्यदेव की कथा
शनिदेव को काला तिल चढ़ाने के पीछे पिता-पुत्र के संबंधों की एक रोचक कथा है। शास्त्रों के अनुसार, एक बार क्रोध में आकर सूर्यदेव ने अपने तेज से शनिदेव के घर ‘कुंभ’ को जलाकर राख कर दिया था।
हालांकि, बाद में सूर्यदेव को अपनी गलती का अहसास हुआ और वे पुत्र शनि से मिलने पहुंचे। जब सूर्यदेव वहां पहुंचे, तो शनिदेव के पास स्वागत के लिए कुछ नहीं था, सिवाय काले तिल के।
उन्होंने जले हुए घर में बचे काले तिलों से ही पिता का आदर-सत्कार किया। इस भाव से सूर्यदेव बहुत प्रसन्न हुए।
तभी से यह मान्यता स्थापित हो गई कि शनिवार को सच्चे मन से काला तिल अर्पित करने वाले की हर मनोकामना शनिदेव पूरी करते हैं।



















