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Taslima Nasreen UCC Statement : तसलीमा नसरीन ने भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में यूसीसी लागू करने की उठाई मांग

बांग्लादेश से निर्वासित लेखिका तसलीमा नसरीन ने कोलकाता में संवाददाता सम्मेलन के दौरान भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश तीनों देशों में समान नागरिक संहिता लागू करने पर जोर दिया है। 19 साल बाद शहर लौटीं लेखिका ने अपने सम्मान समारोह में कवि जॉय गोस्वामी को बोलने से रोके जाने पर गहरा दुख भी प्रकट किया।

Taslima Nasreen UCC Statement : तसलीमा नसरीन ने भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश में यूसीसी लागू करने की उठाई मांग

HIGHLIGHTS

  • तसलीमा नसरीन ने तीनों देशों में यूसीसी जरूरी बताया
  • बांग्लादेश में हिंदू महिलाओं के संपत्ति अधिकार का मुद्दा उठाया
  • 19 साल बाद कोलकाता लौटने पर जताई बेहद खुशी
  • रवींद्र सदन में जॉय गोस्वामी के अपमान पर जताई नाराजगी

कोलकाता, 3 अगस्त 2026 (दून हॉराइज़न)।

Taslima Nasreen UCC Statement : बांग्लादेश से निर्वासित चर्चित लेखिका तसलीमा नसरीन ने भारत में समान नागरिक संहिता लागू करने की पुरजोर वकालत की है। कोलकाता में आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस को संबोधित करते हुए उन्होंने साफ कहा कि लैंगिक भेदभाव मिटाने और महिलाओं को बराबरी का हक देने के लिए यूसीसी बेहद जरूरी है। उनका मानना है कि यह जरूरत केवल भारत तक सीमित नहीं है, बल्कि पड़ोसी मुल्कों में भी इसे तुरंत लाया जाना चाहिए।

तसलीमा नसरीन ने सार्वजनिक मंच से कहा कि वह पिछले 40 सालों से लगातार यूसीसी के लिए संघर्ष कर रही हैं। किसी भी सभ्य और लोकतांत्रिक देश में हर नागरिक के लिए एक जैसा कानून होना अनिवार्य शर्त है। भारत के साथ-साथ बांग्लादेश और पाकिस्तान को भी बिना किसी देरी के समान नागरिक संहिता को अपने कानूनी ढांचे में शामिल करना चाहिए। महिलाओं को आज भी हर स्तर पर असमानता झेलनी पड़ती है, जिसे यूसीसी लागू करके ही पूरी तरह खत्म किया जा सकता है।

पश्चिम बंगाल सरकार द्वारा राज्य में यूसीसी के मसौदे की समीक्षा के लिए हाल ही में एक उच्च स्तरीय समिति का गठन किया गया है। राज्य प्रशासन की ओर से जारी आधिकारिक अधिसूचना के अनुसार यह समिति कानून के व्यापक प्रभाव और तकनीकी बारीकियों की जांच करेगी। किसी भी अंतिम विधायी कदम से पहले समिति इस ड्राफ्ट की हर धारा का सूक्ष्म अध्ययन करने वाली है। इसी पृष्ठभूमि के बीच तसलीमा का यह बयान सामने आया है।

63 वर्षीय लेखिका ने बांग्लादेश की सामाजिक स्थिति पर खुलकर बात करते हुए कहा कि समानता ही किसी भी आधुनिक सभ्यता की असली नींव है। बांग्लादेश का जिक्र करते हुए उन्होंने दुख व्यक्त किया कि वहां अब भी महिलाओं को बुनियादी अधिकारों से वंचित रखा जा रहा है।

उन्होंने बताया कि बांग्लादेश में हिंदू महिलाओं को संपत्ति के मामले में पुरुषों के बराबर अधिकार नहीं मिले हुए हैं। वहां लड़कियां अपने पिता की जायदाद में वैध उत्तराधिकारी नहीं बन सकती हैं। अगर हिंदू महिलाओं को सही मायनों में आजादी और सामाजिक बराबरी देनी है, तो वहां यूसीसी लागू करना ही एकमात्र रास्ता है।

तसलीमा नसरीन करीब 19 वर्षों के लंबे अंतराल के बाद शनिवार को कोलकाता वापस लौटी हैं। शहर में वापसी के बाद रवींद्र सदन में आयोजित एक विशेष नागरिक कार्यक्रम में उन्हें औपचारिक रूप से सम्मानित किया गया।

उन्हें साल 2007 में अपनी चर्चित किताब ‘द्विखंडितो’ के प्रकाशन के बाद हुए भारी विरोध-प्रदर्शनों के चलते शहर छोड़ना पड़ा था। तत्कालीन वाम मोर्चा सरकार के प्रशासनिक दबाव के कारण उन्हें अचानक कोलकाता से जाना पड़ा था। इतने सालों बाद अपनी पसंदीदा जगह लौटने पर उन्होंने बेहद राहत महसूस की।

रवींद्र सदन में हुए सम्मान समारोह के दौरान मंच पर हुई एक घटना से तसलीमा काफी आहत नजर आईं। उन्होंने संवाददाता सम्मेलन में खुलकर कहा कि कार्यक्रम में दर्शकों के एक वर्ग के हंगामे के कारण मशहूर कवि जॉय गोस्वामी को बिना भाषण दिए मंच छोड़कर जाना पड़ा, जिससे उन्हें गहरा अपमान महसूस हुआ।

हंगामा तब शुरू हुआ जब तसलीमा ने खुद जॉय गोस्वामी को मंच पर आमंत्रित किया था और उनसे सभा को संबोधित करने की गुजारिश की थी। दर्शकों के विरोध के चलते गोस्वामी को चुपचाप पीछे हटना पड़ा। तसलीमा ने कहा कि उन्होंने खुद जॉय को न्योता दिया था, इसलिए उनके साथ हुआ दुर्व्यवहार सीधे तौर पर खुद उनका अपना अपमान है।

घटना के समय को याद करते हुए लेखिका ने कहा कि उन्होंने अपने ठीक पहले दिए भाषण में अभिव्यक्ति की आजादी का समर्थन किया था। लोकतंत्र में हर व्यक्ति को अपनी बात रखने की पूरी छूट मिलनी चाहिए। किसी भी लेखक या कवि को अपने विचार जाहिर करने से रोकना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।

विरोध करने वाले लोगों के दोहरे रवैये पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि जिन लोगों ने उनके भाषण पर तालियां बजाईं, उन्हीं लोगों ने एक वरिष्ठ कवि को बोलने से रोक दिया। यह पूरी तरह से विरोधाभासी आचरण है। जब लोग अभिव्यक्ति की आजादी का समर्थन करते हैं, तो उन्हें दूसरों के बोलने के अधिकार का भी सम्मान करना सीखना होगा।

तसलीमा नसरीन ने घोषणा की कि वह जल्द ही जॉय गोस्वामी से व्यक्तिगत रूप से मिलने उनके आवास पर जाएंगी। घटना के बाद उनसे सीधी बात नहीं हो सकी थी, इसलिए वह आज या कल में उनसे मुलाकात कर अपनी बात रखेंगी।

उन्होंने उम्मीद जताई कि कोलकाता जैसे सांस्कृतिक शहर में भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति नहीं होगी। कोलकाता ऐतिहासिक रूप से हमेशा से ही प्रगतिशील विचारों, बहस और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का केंद्र रहा है।

अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराएं होना एक स्वाभाविक बात है, लेकिन हर व्यक्ति को अपनी राय रखने का अवसर मिलना ही चाहिए। कोलकाता के लोग लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास रखते हैं और इस शहर की पहचान वैचारिक विविधता से ही है।

पश्चिम बंगाल की राजनीति पर बात करते हुए उन्होंने वाम मोर्चा, तृणमूल कांग्रेस और केंद्र की भाजपा नीत सरकार के रवैये की तुलना की। तसलीमा ने कहा कि तीनों प्रशासनों के रुख में जमीन-आसमान का अंतर रहा है।

एक सरकार ने उन्हें जबरन राज्य से बाहर कर दिया था, दूसरी सरकार ने सालों तक उनके लौटने के रास्ते बंद रखे। केंद्र सरकार ने उन्हें दोबारा कोलकाता आने की अनुमति दी है। पुराने कड़वे अनुभवों को याद करने के बजाय वह इस बात का जश्न मनाना चाहती हैं कि वह वापस इस शहर में आ पाई हैं।

तसलीमा को इस यात्रा के लिए ‘सेक्युलर मिशन’ नामक सामाजिक संगठन ने आमंत्रित किया था। आमंत्रण स्वीकार करने के बाद राज्य प्रशासनिक तंत्र ने उन्हें पूरी सुरक्षा व्यवस्था मुहैया कराई और उनके प्रवास की सुचारू व्यवस्था की।

19 साल बाद मिली इस वापसी को तसलीमा ने अन्याय के खिलाफ एक बड़ी जीत माना। उन्होंने कहा कि अन्याय का दौर लंबा जरूर हो सकता है, लेकिन वह हमेशा कायम नहीं रह सकता।

तसलीमा नसरीन ने साफ किया कि उनकी पूरी लड़ाई हमेशा से महिलाओं के मौलिक अधिकारों और बोलने की आजादी के लिए रही है। वह किसी भी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध में काम नहीं करती हैं।

उल्लेखनीय है कि तसलीमा को 1994 में अपनी धर्मनिरपेक्ष लेखनी के कारण बांग्लादेश छोड़ना पड़ा था। कट्टरपंथी समूहों द्वारा लगातार मिल रही जान से मारने की धमकियों के बाद से वह लगातार निर्वासित जीवन बिता रही हैं।

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Shailendra Pokhriyal

शैलेन्द्र पोखरियाल 'दून हॉराइज़न' में वरिष्ठ राष्ट्रीय संवाददाता के तौर पर देश की सियासत और प्रमुख राष्ट्रीय घटनाओं को कवर करते हैं। केंद्र सरकार की नीतियों, संसद के सत्रों और बड़े राजनीतिक घटनाक्रमों पर उनकी गहरी पकड़ है। शैलेन्द्र का उद्देश्य राजनीतिक बयानों और सरकारी फैसलों के पीछे की असली सच्चाई को निष्पक्ष रूप से पाठकों के सामने रखना है। उनका लंबा पत्रकारीय अनुभव उन्हें जटिल राष्ट्रीय मुद्दों का आसान हिंदी में विश्लेषण करने में मदद करता है। वे पूरी तरह से शोध-आधारित (Fact-checked) और जनहित से जुड़ी बेबाक पत्रकारिता करने के लिए जाने जाते हैं।

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