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आखिर कौन है Parle-G की मशहूर बच्ची? जानिए इस तस्वीर की पूरी कहानी

पार्ले जी के पैकेट पर दिखती आ रही मासूम बच्ची की पहचान को लेकर सालों से नीरू देशपांडे और सुधा मूर्ति जैसे कई नाम सामने आते रहे हैं। कंपनी के आधिकारिक बयान के अनुसार, यह कोई वास्तविक तस्वीर नहीं बल्कि 60 के दशक में तैयार किया गया एक काल्पनिक इलस्ट्रेशन (चित्र) है।

Parle G Girl Mystery

Parle G Girl Mystery : चाय का कप हो और साथ में पार्ले जी का बिस्किट न हो, ऐसा कम ही देखने को मिलता है। दशकों से यह बिस्किट हर भारतीय घर का हिस्सा रहा है।

बिस्किट के स्वाद के साथ-साथ इसके पीले-सफेद पैकेट पर बनी एक छोटी बच्ची की फोटो भी हमेशा चर्चा में रही है। अक्सर लोगों के मन में यह सवाल आता है कि यह मासूम बच्ची आखिर है कौन?

सोशल मीडिया और इंटरनेट पर इस बच्ची की पहचान को लेकर कई तरह के दावे किए जाते रहे हैं। कभी इसे नागपुर की नीरू देशपांडे बताया गया, तो कभी गुंजन गुंदानिया।

हाल के सालों में यह अफवाह भी खूब फैली कि यह इंफोसिस फाउंडेशन की चेयरपर्सन सुधा मूर्ति के बचपन की तस्वीर है। लेकिन इन तमाम दावों की हकीकत कुछ और ही है।

कंपनी का आधिकारिक खुलासा

इस रहस्य पर से पर्दा खुद पार्ले प्रोडक्ट्स के ग्रुप प्रोडक्ट मैनेजर ने उठाया था। कंपनी की ओर से साफ किया गया कि पैकेट पर दिख रही बच्ची कोई वास्तविक इंसान नहीं है।

यह किसी रियल बच्चे की फोटो नहीं, बल्कि 1960 के दशक में ‘एवरेस्ट क्रिएटिव’ नाम की एडवरटाइजिंग एजेंसी के आर्टिस्ट मगनलाल दहिया द्वारा तैयार की गई एक काल्पनिक पेंटिंग (इलास्ट्रेशन) है।

कंपनी को अपनी रीब्रांडिंग के लिए एक मासूम और प्यारे चेहरे की तलाश थी, जिसे आर्टिस्ट ने अपनी कल्पना से कैनवास पर उतारा था।

स्वदेशी आंदोलन से हुई थी शुरुआत

पार्ले ब्रांड की कहानी भी बिस्किट की तरह बेहद दिलचस्प है। साल 1929 में स्वदेशी आंदोलन के दौर में मोहनलाल दयाल चौहान ने मुंबई के विले पार्ले इलाके में पहली फैक्ट्री लगाई थी।

जगह के नाम पर ही इस वेंचर का नाम ‘हाउस ऑफ पार्ले’ पड़ा। शुरुआत में सिर्फ 12 लोगों के साथ टॉफी और कैंडीज बनाई जाती थीं।

इसके बाद 1938 में कंपनी ने भारतीय बाजार में ‘पार्ले ग्लूको’ बिस्किट लॉन्च किया, जो उस समय ब्रिटिश ब्रांड्स के महंगे बिस्किट्स का एक किफायती और स्वदेशी विकल्प बनकर उभरा।

युद्ध, गेहूं की किल्लत और ‘पार्ले-जी’ का जन्म

द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश-भारतीय सैनिकों के बीच इस बिस्किट की जबरदस्त मांग रही। 1947 में देश के विभाजन के समय भारत में गेहूं की भारी किल्लत हो गई, जिसके चलते पार्ले ग्लूको का उत्पादन कुछ समय के लिए रोकना पड़ा था।

संकट से उबरने के लिए कंपनी ने गेहूं की जगह जौ का इस्तेमाल कर बिस्किट तैयार किया। 1980 के दशक में बाजार में कई मिलते-जुलते ग्लूकोज बिस्किट आने लगे।

अपनी अलग पहचान बनाए रखने के लिए कंपनी ने ‘पार्ले ग्लूको’ का नाम बदलकर Parle-G कर दिया। यहाँ

‘G’ का मतलब ‘ग्लूकोज’ था, जिसे बाद में ‘जी फॉर जीनियस’ के रूप में प्रमोट किया गया। इसी बदलाव के साथ पीले और सफेद स्ट्रिप्स वाला नया पैकेट और यह आइकोनिक बच्ची का चित्र ब्रांड का मुख्य चेहरा बन गया।

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Gudiya Sagar

गुड़िया सागर 'दून हॉराइज़न' की मल्टीमीडिया और ट्रेंडिंग न्यूज़ प्रोड्यूसर हैं। वे करियर, वायरल खबरों और वीडियो जर्नलिज्म में विशेष विशेषज्ञता रखती हैं। डिजिटल मीडिया के बदलते ट्रेंड्स और युवाओं की पसंद को समझना गुड़िया की सबसे बड़ी ताकत है। सरकारी नौकरियों, शिक्षा और करियर से जुड़ी हर अहम जानकारी वे पूरी फैक्ट-चेकिंग के बाद ही युवाओं तक पहुंचाती हैं। इंटरनेट पर वायरल हो रही भ्रामक खबरों की सच्चाई (Fact Check) सामने लाने और वीडियो फॉर्मेट में निष्पक्ष खबरें पेश करने के लिए गुड़िया को पत्रकारिता जगत में विशेष रूप से जाना जाता है।

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