दून हॉराइज़न, मुंबई (12 सितंबर) : महाराष्ट्र में 14 सितंबर से शुरू होने वाले गणेशोत्सव के दौरान पुणे जिले में लगातार 10 दिनों तक शराब बिक्री बंद रखने के स्थानीय प्रशासन के फरमान पर बॉम्बे हाईकोर्ट ने कड़ा एतराज जताया है।
होटल मालिकों और रेस्टोरेंट-बार एसोसिएशन की याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए अदालत ने साफ लहजे में पूछा कि जब समूचे राज्य में ऐसा कोई नियम नहीं है, तो अकेले पुणे के साथ यह सौतेला व्यवहार क्यों?
लाइसेंसधारियों के अधिकारों पर सीधा हमला
चीफ जस्टिस एमसी त्रिपाठी और जस्टिस अद्वैत सेठना की खंडपीठ ने सुनवाई करते हुए स्पष्ट किया कि जिन कारोबारियों ने सरकार को पूरी फीस देकर शराब बिक्री का वैध लाइसेंस (Liquor License) लिया हुआ है, उनके कामकाज को अचानक 10 दिनों के लिए ठप कर देना प्रशासनिक मनमानी है।
पीठ का मानना था कि कानून व्यवस्था के नाम पर चुनिंदा व्यापारियों के संवैधानिक कारोबारी अधिकारों को असीमित समय तक निलंबित नहीं किया जा सकता।
“क्या प्रशासन यह मानकर बैठा है कि केवल पुणे के नागरिक ही शराब पीकर हंगामा खड़ा करते हैं?” — हाईकोर्ट की मौखिक टिप्पणी

पुणे की छवि और स्वास्थ्य संबंधी चिंताएं
खंडपीठ ने कलेक्टर के तर्क पर सवाल उठाते हुए कहा कि इस तरह के आदेश से ऐसा संदेश जाता है मानो केवल पुणे के लोगों का आचरण संदिग्ध है। अदालत ने चेतावनी दी कि यह फैसला पूरे शहर पर एक नकारात्मक ठप्पा लगाता है।
तल्ख टिप्पणी के बीच अदालत ने चिकित्सीय पहलू की ओर भी ध्यान दिलाया। पीठ ने कहा कि शराब की गंभीर लत (Alcohol Withdrawal Syndrome) से जूझ रहे लोगों को यदि 10 दिनों तक एकाएक आपूर्ति बंद कर दी जाए, तो उनकी शारीरिक स्थिति बिगड़ सकती है और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराना पड़ सकता है।
वापस लें आदेश, वरना हम करेंगे फैसला
पुणे कलेक्टर की ओर से पेश सरकारी वकील से खंडपीठ ने दो टूक पूछा कि क्या प्रशासन इस अव्यावहारिक आदेश को स्वयं वापस ले रहा है? अदालत ने आगाह किया कि यदि जिला तंत्र ने अपना रुख स्पष्ट नहीं किया, तो न्यायिक समीक्षा के तहत आदेश को निरस्त करने संबंधी निर्देश जारी किए जाएंगे।
महाराष्ट्र मद्यनिषेध अधिनियम के तहत आमतौर पर विसर्जन के प्रमुख दिनों या अनंत चतुर्दशी जैसे विशिष्ट अवसरों पर ही ड्राई डे लागू किया जाता रहा है। अब सबकी निगाहें प्रशासन के आगामी जवाब पर टिकी हैं।













