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Ankita Case : माता-पिता को छोड़ अनिल जोशी की FIR पर एक्शन क्यों? संगठनों ने घेरा

अंकिता भंडारी हत्याकांड में सीबीआई जांच की सिफारिश पर सामाजिक संगठनों ने सवाल उठाए हैं। देहरादून प्रेस क्लब में हुई वार्ता में संगठनों ने आपत्ति जताई कि सरकार ने पीड़िता के माता-पिता की मांग को दरकिनार कर पर्यावरणविद अनिल जोशी की एफआईआर को आधार क्यों बनाया। आरोप है कि जांच का दायरा जानबूझकर सीमित किया जा रहा है।

Published on: January 13, 2026 6:58 PM
Ankita Case
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HIGHLIGHTS

  • माता-पिता के पत्र के बजाय अनिल जोशी की एफआईआर पर सीबीआई जांच की सिफारिश पर विवाद।
  • सामाजिक संगठनों का आरोप: सीबीआई जांच केवल वायरल ऑडियो तक सीमित की गई, पूरे हत्याकांड की नहीं।
  • अनिल जोशी की दो साल की चुप्पी और हेस्को (HESCO) के जरिए सरकारी कामों में भागीदारी पर सवाल।
  • आरोप है कि वीआईपी को बचाने के लिए माता-पिता को मुख्य पैरोकार नहीं बनाया गया।

Ankita Case : देहरादून प्रेस क्लब में मंगलवार को विभिन्न सामाजिक संगठनों ने अंकिता हत्याकांड की सीबीआई जांच की प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। संगठनों ने सीधा आरोप लगाया है कि इस मामले में पर्यावरणविद अनिल जोशी को मुख्य पैरोकार बनाना और अंकिता के माता-पिता की अनदेखी करना राजनीतिक और प्रशासनिक संरक्षण का हिस्सा लग रहा है।

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माता-पिता की अनदेखी क्यों?

मूल निवास संघर्ष समिति के संयोजक लूशून टोडरिया ने सवाल उठाया कि जब अंकिता के माता-पिता लगातार न्याय की गुहार लगा रहे थे, तो सरकार ने उनके पत्र का संज्ञान क्यों नहीं लिया? अचानक अनिल जोशी की एफआईआर पर ही सीबीआई जांच की संस्तुति क्यों दी गई? टोडरिया ने कहा कि जोशी पिछले दो साल से इस मुद्दे पर चुप थे, अब अचानक उन्हें घटना की गंभीरता का अहसास कैसे हुआ, यह समझ से परे है।

उत्तराखंड क्रांति सेना के ललित श्रीवास्तव ने भी यही मुद्दा उठाया। उनका कहना था कि जब माता-पिता पहले ही शिकायत दर्ज करा चुके थे, तो उसी आधार पर जांच आगे बढ़ाई जा सकती थी। नई शिकायत और नए पैरोकार की जरूरत पड़ना संदेह पैदा करता है।

जांच का दायरा सीमित करने का आरोप

उत्तराखंड स्वाभिमान मोर्चा के प्रमोद काला ने तकनीकी पेंच की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि आमतौर पर सीबीआई जांच पूरे प्रकरण की होती है। मगर इस मामले में जांच को सिर्फ वर्तमान में वायरल हुए ऑडियो क्लिप तक सीमित कर दिया गया है। यह न्याय की मूल भावना के साथ खिलवाड़ है।

मूल निवास भू-कानून संघर्ष समिति के राकेश नेगी ने कहा कि यह अपराध राजनीतिक संरक्षण के साये में हुआ लगता है। अब तक की पुलिस कार्यवाही और जांच एजेंसियों का रवैया कई सवाल खड़े करता है, जिनका जवाब सरकार को देना होगा।

अनिल जोशी की भूमिका और सरकारी कनेक्शन

पहाड़ स्वाभिमान सेना के अध्यक्ष पंकज उनियाल ने अनिल जोशी की निष्पक्षता पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जोशी ‘हेस्को’ (HESCO) संस्था से जुड़े हैं और सरकारी कार्यों में उनकी सक्रिय भूमिका रहती है। ऐसे व्यक्ति का मुख्य पैरोकार बनना जांच को प्रभावित कर सकता है।

राष्ट्रीय रीजनल पार्टी की अध्यक्ष सुलोचना इस्टवाल ने याद दिलाया कि अनिल जोशी धराली आपदा, जोशीमठ संकट और देवदार कटान जैसे ज्वलंत मुद्दों पर खामोश रहे। उनकी यह चुप्पी और अब अंकिता केस में अचानक सक्रियता उन्हें संदेह के घेरे में लाती है।

वीआईपी को बचाने की कोशिश?

आकांक्षा नेगी ने आरोप लगाया कि सत्ताधारी दल से जुड़े नेता वीआईपी को बचाने की कोशिश कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि अगर मुख्यमंत्री पौड़ी जाकर पीड़ित परिवार से मिल सकते थे, तो उन्हें अपने आवास पर बुलाकर गुप्त बैठक क्यों की गई?

पीड़ित परिवार सुप्रीम कोर्ट के जज की निगरानी में जांच चाहता था, लेकिन सरकार ने अनिल जोशी की शिकायत पर एफआईआर दर्ज कर दी। यह काम माता-पिता को मुख्य शिकायतकर्ता बनाकर भी हो सकता था।

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प्रेस वार्ता में अधिवक्ता संदीप चमोली, पौड़ी बचाओ संघर्ष समिति के नमन चंदोला, अनिल डोभाल, विकास कुमार उत्तराखंडी, नवनीत कुकरेती और कीर्ति बिष्ट भी मौजूद रहे।

Harpreet Singh

हरप्रीत सिंह पिछले 10 वर्षों से 'दून हॉराइज़न' के साथ जुड़े हुए हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में एक दशक का अनुभव रखने वाले हरप्रीत की उत्तराखंड और अन्य राज्यों की खबरों पर गहरी पकड़ है. उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा में उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय से एमबीए (MBA) की डिग्री हासिल की है. इसके अलावा, उन्होंने भारतीय विद्या भवन, मुंबई से पब्लिक रिलेशंस (जनसंपर्क) में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा भी पूरा किया है. अपने अनुभव और शिक्षा के माध्यम से वे पाठकों तक सटीक और विश्लेषणात्मक खबरें पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं. 📧 Email: harpreetssoni9@gmail.com

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