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सचिन थपलियाल का सवाल: वंदेमातरम बोलने वाले नेता गाय पर चुप क्यों?

Published on: December 15, 2025 7:31 PM
सचिन थपलियाल का सवाल: वंदेमातरम बोलने वाले नेता गाय पर चुप क्यों?
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भारत की संस्कृति में गाय को सदियों से पवित्र माना जाता है। हिंदू धर्म में इसे मां के समान पूजा जाता है, क्योंकि यह दूध, गोबर और खेती में मदद जैसे कई लाभ देती है। लेकिन आज की हकीकत देखें तो देश में गायों की स्थिति चिंताजनक है।

दुनिया का सबसे बड़ा डेयरी उत्पादक देश होने के बावजूद, जहां करीब 19 करोड़ से ज्यादा गाय-बैल हैं, इनकी सुरक्षा पर सवाल उठ रहे हैं। राजनीतिक नेता भले ही धार्मिक नारों में गाय की रक्षा की बात करें, लेकिन जमीनी स्तर पर नीतियां कमजोर पड़ जाती हैं।

गायों की असुरक्षा की जड़ें गहरी हैं। कई जगहों पर कानूनी कमजोरियां हैं, तो कहीं संसाधनों की कमी। आइए समझते हैं कि आखिर क्यों गायें आज भी खतरे में हैं, और क्या समाधान हो सकते हैं।

बिना सख्त कानून वाले राज्य और उनकी चुनौतियां

कुछ राज्यों में गायों के कत्ल पर कोई सख्त प्रतिबंध नहीं है, जिससे वहां खुले तौर पर इस तरह की गतिविधियां चलती हैं। पश्चिम बंगाल और केरल जैसे इलाकों में, साथ ही उत्तर-पूर्व के मिजोरम, नागालैंड, मेघालय, त्रिपुरा, सिक्किम और अरुणाचल प्रदेश में, गौ-हत्या पर कोई स्पष्ट कानून न होने से समस्या बढ़ जाती है। इन जगहों पर सांस्कृतिक और स्थानीय परंपराएं भी प्रभाव डालती हैं।

उदाहरण के लिए, मणिपुर में सांस्कृतिक रिवाजों के चलते गाय का मांस अभी भी आम है, भले ही कुछ नियम हों। हाल के आंकड़ों से पता चलता है कि भारत के 28 राज्यों में से सिर्फ 20 में ही गौ-हत्या पर विभिन्न प्रकार के प्रतिबंध हैं, बाकी में यह खुला है। इससे गायों की तस्करी और अवैध व्यापार को बढ़ावा मिलता है।

प्रतिबंध वाले राज्य भी नहीं हैं सुरक्षित

कई राज्य जहां गौ-हत्या पर कानून हैं, वहां भी भैंस या बफेलो के कत्ल को लाइसेंस के साथ अनुमति दी जाती है। महाराष्ट्र, गुजरात, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे जगहों पर यह प्रथा चलती है। लेकिन समस्या सिर्फ कानून की नहीं, अमल की है। यहां गायें आर्थिक दबावों का शिकार होती हैं।

किसान जब गाय दूध देना बंद कर देती है, तो उसे छोड़ देते हैं, क्योंकि रखरखाव महंगा पड़ता है। राष्ट्रीय पशुधन जनगणना के मुताबिक, भारत में कुल बोवाइन पशुधन 30 करोड़ से ज्यादा है, लेकिन इनमें से कई आवारा हो जाते हैं।

शहरी इलाकों में बढ़ती मुश्किलें

बड़े शहरों और उनके आसपास के क्षेत्रों में गायों की हालत सबसे खराब है। दिल्ली एनसीआर, मुंबई, लखनऊ, कानपुर, पटना, कोलकाता, हैदराबाद और बेंगलुरु जैसे महानगरों में दूध न देने वाली गायों को सड़कों पर छोड़ दिया जाता है। यहां गौशालाओं की कमी है, और निजीकरण के चलते समस्या बढ़ गई है। ये गायें प्लास्टिक, कचरा और जहरीले पदार्थ खाकर बीमार पड़ती हैं।

सड़क हादसों में भी गायें सबसे ज्यादा प्रभावित होती हैं। मध्य प्रदेश में पिछले दो सालों में आवारा पशुओं से जुड़े 237 हादसों में 94 लोगों की मौत हुई, जबकि हरियाणा में पांच सालों में 900 से ज्यादा मौतें दर्ज की गईं। देशभर में 50 लाख से ज्यादा आवारा गायें हैं, जो फसलों को नुकसान पहुंचाती हैं और बीमारियां फैलाती हैं।

सीमावर्ती क्षेत्रों में तस्करी का खतरा

सीमा के करीब के इलाकों में गायों की तस्करी बड़ी समस्या है। पश्चिम बंगाल, असम, बिहार और उत्तर प्रदेश-बिहार बॉर्डर पर संगठित गिरोह सक्रिय हैं। सीमा निगरानी की कमजोरी से यह नेटवर्क फल-फूल रहा है। स्थानीय प्रशासन की लापरवाही से गरीब पशुपालक शोषित होते हैं, और गायें सिर्फ आर्थिक वस्तु बनकर रह जाती हैं।

भारत-बांग्लादेश सीमा पर गौ-तस्करी 2016 के बाद आधी हो गई है, लेकिन अभी भी हजारों गायें हर साल चोरी हो जाती हैं। असम में बड़े नेटवर्क काम करते हैं, जहां कानूनी व्यापार से ज्यादा अवैध कारोबार है।

सूखे और आदिवासी इलाकों की परेशानियां

बुंदेलखंड, मराठवाड़ा, विदर्भ, झारखंड, छत्तीसगढ़ और ओडिशा के कुछ हिस्सों में सूखा और पानी की कमी से गायें प्रभावित हैं। यहां चारे का संकट है, पलायन बढ़ रहा है, और गौशालाओं की कमी है। गायें संरक्षण की बजाय संसाधनों की कमी की शिकार हो रही हैं। किसान मजबूरी में उन्हें छोड़ देते हैं, क्योंकि रखना मुश्किल हो जाता है।

औद्योगिक खेती का प्रभाव

पंजाब, हरियाणा, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश के कुछ इलाकों में ट्रैक्टर-आधारित खेती ने पशुओं को बेकार बना दिया है। देशी नस्लों का जगह विदेशी नस्लें ले रही हैं, और डेयरी उद्योग में उत्पादकता का दबाव है। दूध बंद होते ही गायों को त्याग दिया जाता है, और वे परंपरा से कटकर सिर्फ व्यापार की चीज बन जाती हैं।

संरक्षित इलाकों में भी कमियां

उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे जगहों पर गांव-गांव में गौशालाएं हैं, लेकिन पलायन, भ्रष्टाचार और प्रबंधन की कमी से ये मौत के इंतजार वाली जगह बन गई हैं। चिकित्सा, पोषण और अनुदान की कमी है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि देश में 5 हजार से ज्यादा गौशालाएं हैं, लेकिन सिर्फ 1837 ही मान्यता प्राप्त हैं। इनमें टिक संक्रमण जैसी समस्याएं आम हैं, और करीब 6 लाख पशु रखे जाते हैं, लेकिन हालत खराब है।

मूल समस्या और आगे का रास्ता

गायों की असुरक्षा की असली वजह कानूनों, नीतियों और योजनाओं की कमी है। राजनीति में गौ-रक्षा के नारे तो हैं, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर इसे मां का दर्जा क्यों नहीं दिया जाता? आम आदमी पार्टी केंद्र सरकार से मांग कर रही है कि गौ-माता को राष्ट्रमाता का दर्जा दिया जाए। इससे मजबूत कानून और संसाधन जुटाने में मदद मिलेगी। अगर हम सही कदम उठाएं, जैसे गौशालाओं को बेहतर बनाना, तस्करी रोकना और किसानों को सहायता देना, तो गायों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सकती है। यह सिर्फ धार्मिक मुद्दा नहीं, बल्कि आर्थिक और पर्यावरणीय भी है।

Harpreet Singh

हरप्रीत सिंह पिछले 10 वर्षों से 'दून हॉराइज़न' के साथ जुड़े हुए हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में एक दशक का अनुभव रखने वाले हरप्रीत की उत्तराखंड और अन्य राज्यों की खबरों पर गहरी पकड़ है. उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा में उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय से एमबीए (MBA) की डिग्री हासिल की है. इसके अलावा, उन्होंने भारतीय विद्या भवन, मुंबई से पब्लिक रिलेशंस (जनसंपर्क) में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा भी पूरा किया है. अपने अनुभव और शिक्षा के माध्यम से वे पाठकों तक सटीक और विश्लेषणात्मक खबरें पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

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