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22 दिसंबर के कोर्ट आदेश के बाद ऋषिकेश में तनाव, यशपाल आर्य ने लिखा सीएम को पत्र

ऋषिकेश के पशुलोक की 2866 एकड़ भूमि पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मची अफरा-तफरी के बीच वरिष्ठ नेता यशपाल आर्य ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को पत्र लिखा है। उन्होंने राज्य भर में वन भूमि पर बसे हजारों परिवारों को उजड़ने से बचाने के लिए विधानसभा का विशेष

Published on: January 5, 2026 7:59 PM
22 दिसंबर के कोर्ट आदेश के बाद ऋषिकेश में तनाव, यशपाल आर्य ने लिखा सीएम को पत्र
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HIGHLIGHTS

  • ऋषिकेश संकट: सुप्रीम कोर्ट के निर्देश (22 दिसंबर 2025) के बाद पशुलोक क्षेत्र में पुलिस और वन विभाग की आमद से हजारों लोगों में दहशत है।
  • बड़ा असर: एम्स ऋषिकेश, आईडीपीएल और टिहरी विस्थापितों के आवास इसी 2866 एकड़ वन भूमि के दायरे में हैं।
  • पहाड़ से मैदान तक: बिंदुखत्ता, मालधन और केदारनाथ घाटी के हक-हकूकधारियों पर भी बेदखली का खतरा मंडरा रहा है।
  • विपक्ष की मांग: वनाधिकार कानून 2006 के तहत निवासियों को हक दिलाने के लिए तत्काल विधानसभा का विशेष सत्र बुलाया जाए।

Uttarakhand Forest Land Eviction Crisis : ऋषिकेश के पशुलोक क्षेत्र की 2866 एकड़ भूमि को लेकर माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा 22 दिसंबर 2025 को दिए गए कठोर निर्देशों के बाद उत्तराखंड की राजनीति गरमा गई है।

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वरिष्ठ कांग्रेस नेता और पूर्व विधानसभा अध्यक्ष यशपाल आर्य ने मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी को एक विस्तृत पत्र भेजकर राज्य में ‘वन भूमि बनाम रिहायश’ के मुद्दे पर विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने की मांग की है। आर्य ने चेतावनी दी है कि यदि सरकार ने समय रहते वैधानिक उपाय नहीं किए, तो राज्य सरकार और निवासियों के बीच बड़ा संघर्ष छिड़ सकता है।

ऋषिकेश में अफरा-तफरी का माहौल

यशपाल आर्य ने अपने पत्र में बताया कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मुख्य सचिव और मुख्य वन संरक्षक को जांच समिति बनाने के निर्देश मिले हैं। इसके चलते सरकारी जांच कमेटियां, पुलिस बल और वन विभाग की टीमें ऋषिकेश के रिहायशी इलाकों में जबरन प्रवेश कर रही हैं, जिससे वहां दशकों से रह रहे हजारों परिवारों में दहशत का माहौल है।

यह वही जमीन है जिसे वन विभाग ने 1952 के आसपास महात्मा गांधी की शिष्या मीरा बेन को लीज पर दिया था। बाद में यहां एम्स (AIIMS) ऋषिकेश, आईडीपीएल (IDPL) और पशुलोक जैसे बड़े सरकारी संस्थान बने। इतना ही नहीं, टिहरी बांध विस्थापितों की एक बड़ी आबादी को भी इसी जमीन पर सरकार द्वारा बसाया गया था। अब न्यायालय के आदेश के बाद इन सभी के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लग गया है।

वनाधिकार कानून की अनदेखी का आरोप

पत्र में तर्क दिया गया है कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की सरकार द्वारा बनाए गए ‘वनाधिकार कानून 2006’ का उत्तराखंड में सही इस्तेमाल नहीं किया गया। देश के अन्य राज्यों ने जहां अपने लाखों निवासियों को वन भूमि पर मालिकाना हक दिया, वहीं उत्तराखंड में पीढ़ियों से रह रहे लोगों या सरकारी विभागों को भी आज ‘कब्जेदार’ माना जा रहा है।

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आर्य ने राज्य के विभिन्न हिस्सों का हवाला देते हुए बताया कि रामनगर के मालधन चैड़ के 31 वन ग्राम, हल्द्वानी का दमुवाढुंगा और नैनीताल का बिंदुखत्ता (जो 200 साल से बसा है) आज भी राजस्व ग्राम बनने की बाट जोह रहे हैं। बिंदुखत्ता को राजस्व ग्राम बनाने की संस्तुति 19 जून 2024 को भेजी जा चुकी है, फिर भी सरकार निवासियों को अतिक्रमणकारी मान रही है।

पहाड़ों में पुश्तैनी हकों पर संकट

यह संकट केवल मैदानी इलाकों तक सीमित नहीं है। पत्र के अनुसार, द्वितीय केदार मदमहेश्वर, तृतीय केदार तुंगनाथ और चतुर्थ केदार रुद्रनाथ के हक-हकूकधारियों को भी नोटिस दिए जा रहे हैं। पिंडर घाटी में 1400 परिवारों और पौड़ी के मंजवी गांव के निवासियों को 150 साल से वहां रहने के बावजूद हटाने के नोटिस मिले हैं।

यशपाल आर्य ने मुख्यमंत्री से आग्रह किया है कि अदालतों में पैरवी की सीमाओं को देखते हुए, इस मुद्दे का हल केवल विधानसभा में ही निकल सकता है। उन्होंने कहा कि राज्य के लोगों को उजड़ने से बचाना सरकार का प्रमुख कर्तव्य है, इसलिए तत्काल विशेष सत्र आहूत कर वनाधिकार कानून और पट्टों पर व्यापक चर्चा कर कोई ठोस रास्ता निकाला जाए।

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Harpreet Singh

हरप्रीत सिंह पिछले 10 वर्षों से 'दून हॉराइज़न' के साथ जुड़े हुए हैं. पत्रकारिता के क्षेत्र में एक दशक का अनुभव रखने वाले हरप्रीत की उत्तराखंड और अन्य राज्यों की खबरों पर गहरी पकड़ है. उन्होंने अपनी उच्च शिक्षा में उत्तराखंड तकनीकी विश्वविद्यालय से एमबीए (MBA) की डिग्री हासिल की है. इसके अलावा, उन्होंने भारतीय विद्या भवन, मुंबई से पब्लिक रिलेशंस (जनसंपर्क) में पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा भी पूरा किया है. अपने अनुभव और शिक्षा के माध्यम से वे पाठकों तक सटीक और विश्लेषणात्मक खबरें पहुँचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं.

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