Mobile Addiction In Kids : स्मार्टफोन अब बच्चों के लिए सिर्फ समय बिताने का खिलौना नहीं रहा, बल्कि यह उनकी दिनचर्या और सोचने के तरीके को पूरी तरह बदल रहा है।
टिक-टॉक, इंस्टाग्राम रील्स और यूट्यूब शॉर्ट्स जैसे प्लेटफॉर्म्स ने बच्चों के खाली समय पर कब्जा कर लिया है। जो कभी मनोरंजन का एक छोटा साधन था, वह अब हर खाली पल का साथी बन गया है।
समस्या वीडियो देखने में बिताए गए घंटों की नहीं, बल्कि उस पैटर्न की है जो बच्चों के दिमाग को लगातार उत्तेजित कर रहा है।
‘बस एक और’ का खतरनाक जाल
इन ऐप्स का डिजाइन ही ऐसा है कि स्क्रॉलिंग कभी रुकती नहीं है। वीडियो मजेदार और ट्रेंडिंग होते हैं, जो बच्चों को तुरंत आकर्षित करते हैं। सबसे बड़ी चुनौती वह मनोवैज्ञानिक दबाव है, जिसे “बस एक और वीडियो” देखने की आदत कहा जाता है।
चूंकि ये ऐप्स विशेष रूप से बच्चों के लिए डिजाइन नहीं किए गए थे, इसलिए कम उम्र के बच्चों के लिए इस आदत पर काबू पाना बेहद मुश्किल हो रहा है। वे अक्सर अकेले में इनका इस्तेमाल करते हैं, जिससे यह लत और गहरी होती जा रही है।
15 सेकंड में बदलता दिमाग
शॉर्ट वीडियो आमतौर पर 15 से 90 सेकंड के होते हैं। हर स्वाइप के साथ एक नया चुटकुला, रोमांच या चौंकाने वाला दृश्य सामने आता है। यह प्रक्रिया दिमाग को लगातार ‘कुछ नया’ खोजने का आदी बना देती है।
नतीजा यह हो रहा है कि बच्चों के लिए किसी एक चीज पर लंबे समय तक ध्यान टिकाना मुश्किल होता जा रहा है। साल 2023 के एक विश्लेषण में सामने आया कि ज्यादा शॉर्ट वीडियो देखने वाले बच्चों में एकाग्रता (Attention Span) और आत्म-नियंत्रण की क्षमता कमजोर पड़ रही है।
नींद और स्वभाव पर सीधा हमला
आजकल ज्यादातर बच्चे सोने से ठीक पहले मोबाइल देखते हैं। स्क्रीन की तेज रोशनी नींद लाने वाले हार्मोन को समय पर सक्रिय नहीं होने देती।
एक हालिया अध्ययन के मुताबिक, लंबे समय तक रील देखने वाले किशोरों में नींद की कमी और सामाजिक बेचैनी (Social Anxiety) अधिक पाई गई है।
जब नींद पूरी नहीं होती, तो इसका सीधा असर बच्चों की मनोदशा, सहनशीलता और पढ़ाई पर पड़ता है। तनाव में रहने वाले बच्चों के लिए इस चक्र से निकलना और भी कठिन होता जा रहा है।
संदर्भ की कमी और ‘ऑटोप्ले’ का जोखिम
किशोरावस्था के मुकाबले छोटे बच्चे इस कंटेंट के प्रति ज्यादा संवेदनशील होते हैं। ‘ऑटोप्ले’ फीचर के कारण एक वीडियो खत्म होते ही दूसरा शुरू हो जाता है।
लंबे वीडियो में कहानी का संदर्भ होता है, लेकिन शॉर्ट्स में खुशी से डर या किसी हिंसक दृश्य के बीच सिर्फ एक स्वाइप का फासला होता है। बच्चों का विकसित हो रहा दिमाग इन तेज बदलावों को समझ नहीं पाता और वे उलझन का शिकार हो जाते हैं।
सुधार की ओर बढ़ते कदम
राहत की बात यह है कि इस डिजिटल खतरे को लेकर अब नीतिगत स्तर पर चर्चा शुरू हो गई है। इंग्लैंड में स्कूलों को सलाह दी गई है कि वे पाठ्यक्रम में ऑनलाइन सुरक्षा और डिजिटल साक्षरता को शामिल करें।
वहां कई स्कूल मोबाइल के उपयोग को सीमित कर रहे हैं। साथ ही, अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अब सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स से सुरक्षित डिफॉल्ट सेटिंग्स और उम्र सत्यापन (Age Verification) को सख्त करने की मांग कर रही हैं।















