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Sawan Pradosh Vrat : आज है सावन सोम प्रदोष व्रत, जानें शिव पूजा के लिए कौन सा समय है सबसे शुभ

सावन महीने का पहला प्रदोष व्रत सोमवार के दिन पड़ने से पूजा का विशेष शुभ संयोग बन रहा है। संध्या काल में भगवान शिव की आराधना और प्रदोष व्रत कथा के श्रवण से जीवन के सभी दुख-दरिद्र दूर होते हैं।

Published On: August 10, 2026 8:59 AM
Sawan Pradosh Vrat

Sawan Pradosh Vrat : सावन के महीने में सोमवार और प्रदोष व्रत का एक साथ होना धार्मिक दृष्टि से बेहद शुभ माना जाता है। श्रावण मास की कृष्ण पक्ष त्रयोदशी तिथि को यह पावन व्रत रखा जाता है।

मान्यता है कि इस दिन प्रदोष काल यानी शाम के समय भगवान शिव की सच्चे मन से पूजा करने पर सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं।

अगर आपने व्रत नहीं भी रखा है, तो भी शाम के समय प्रदोष कथा सुनने मात्र से ही पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

संध्या काल में ऐसे करें पूजन

प्रदोष व्रत में शाम के समय की गई पूजा का विशेष महत्व है। सूर्यास्त से ठीक पहले और उसके तुरंत बाद का समय प्रदोष काल कहलाता है।

  • शाम को स्नान कर स्वच्छ वस्त्र पहनें।
  • शिवलिंग पर गंगाजल और कच्चे दूध से अभिषेक करें।
  • भोलेनाथ को बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल और भस्म अर्पित करें।
  • धूप-दीप जलाकर प्रदोष व्रत कथा का पाठ करें या सुनें।
  • अंत में आरती कर शिव पंचाक्षर मंत्र का जाप करें।

सावन सोम प्रदोष व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार, एक नगर में एक गरीब ब्राह्मणी रहती थी। पति के देहांत के बाद उसके पास जीविका का कोई साधन नहीं बचा था।

वह अपने छोटे बेटे का पेट पालने के लिए रोज सुबह भीख मांगने निकलती और शाम को घर लौटती थी। एक दिन भीख मांगकर लौटते समय ब्राह्मणी को रास्ते में एक बालक दर्द से कराहता हुआ मिला।

दयालु ब्राह्मणी उस घायल बालक को उठाकर अपने घर ले आई। वह बालक असल में विदर्भ देश का राजकुमार था। उसके राज्य पर शत्रुओं ने आक्रमण करके उसके पिता को बंदी बना लिया था और राज्य छीन लिया था, जिससे वह जान बचाकर भाग रहा था।

राजकुमार भी ब्राह्मणी के घर पर ही उसके बेटे की तरह रहने लगा। कुछ समय बाद एक गंधर्व कन्या अंशुमति ने राजकुमार को देखा और उस पर मोहित हो गई। अंशुमति के माता-पिता ने भी राजकुमार को पसंद कर लिया।

कहते हैं कि भगवान शिव ने गंधर्वराज को स्वप्न में दर्शन देकर अंशुमति का विवाह राजकुमार से कराने का आदेश दिया। गंधर्वराज ने अपनी पुत्री का विवाह राजकुमार से कर दिया।

ब्राह्मणी नियमित रूप से पूरी श्रद्धा के साथ प्रदोष व्रत करती थी और भगवान शिव की आराधना करती थी।

इस व्रत के प्रभाव और गंधर्वराज की सेना की मदद से राजकुमार ने अपने राज्य पर फिर से आक्रमण किया। उसने शत्रुओं को खदेड़कर अपने पिता को मुक्त कराया और अपना खोया हुआ राज्य वापस पा लिया।

राजकुमार ने ब्राह्मणी के बेटे को अपना प्रधानमंत्री बनाया और सभी सुख-पूर्वक रहने लगे।

व्रत का महत्व

जैसे भगवान शिव ने ब्राह्मणी के प्रदोष व्रत से प्रसन्न होकर राजकुमार और ब्राह्मणी के दिन फेरे, ठीक वैसे ही जो भक्त प्रदोष काल में शिवजी की पूजा करते हैं और कथा सुनते हैं, उनके जीवन से दरिद्रता और कष्ट दूर हो जाते हैं।

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Ganga

गंगा 'दून हॉराइज़न' में धर्म और ज्योतिष संवाददाता के पद पर कार्यरत हैं। उन्हें वैदिक ज्योतिष, पंचांग, व्रत-त्योहार और वास्तु शास्त्र का गहरा ज्ञान और वर्षों का अनुभव है। गंगा का उद्देश्य सिर्फ दैनिक राशिफल बताना नहीं, बल्कि धर्म और अध्यात्म से जुड़ी सटीक, शोध-आधारित और प्रामाणिक जानकारी आम जनमानस तक पहुंचाना है। वह ज्योतिषीय गणनाओं और धार्मिक मान्यताओं का गहराई से विश्लेषण करती हैं। उनकी तथ्यपरक लेखनी पाठकों को अंधविश्वास से दूर रखकर एक सकारात्मक मार्गदर्शन प्रदान करती है, जिससे वे डिजिटल पाठकों के बीच एक बेहद भरोसेमंद नाम बन गई हैं।

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