दून हॉराइज़न, देहरादून (11 सितंबर): उत्तराखंड जैसे संवेदनशील हिमालयी राज्य में प्राकृतिक आपदाओं के बढ़ते खतरे को देखते हुए शासन ने शैक्षणिक संस्थानों की सुरक्षा को लेकर बड़ा कदम उठाया है। मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी और आपदा प्रबंधन मंत्री मदन कौशिक के निर्देशों पर अमल करते हुए अब प्रदेश के प्रत्येक शासकीय और अशासकीय विद्यालय का अपना अलग स्कूल आपदा प्रबंधन प्लान (School Disaster Management Plan) तैयार किया जाएगा।
सचिवालय में शुक्रवार को आपदा प्रबंधन एवं पुनर्वास सचिव विनोद कुमार सुमन की अध्यक्षता में आयोजित उच्चस्तरीय बैठक में यह रणनीति तय की गई। इस बैठक में राज्य के सभी मुख्य शिक्षा अधिकारियों (CEOs) और शिक्षा विभाग के आला अफसरों ने प्रतिभाग किया।
पहाड़ों की जटिल भौगोलिक परिस्थितियों के अनुरूप बनेगा सुरक्षा ढांचा

उत्तराखंड में अक्सर हर घाटी और ब्लॉक का जोखिम स्तर अलग होता है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए किसी एक सामान्य ढांचे को थोपने के बजाय प्रत्येक विद्यालय का आपदा प्लान उसके आसपास की स्थानीय भौगोलिक स्थिति के अनुसार बनेगा। सीस्मिक जोन 4 और 5 में स्थित इन पहाड़ी स्कूलों के आसपास भूस्खलन, फ्लैश फ्लड, बादल फटना, अत्यधिक बर्फबारी या अचानक आग लगने जैसे खतरों का पहले वैज्ञानिक चिन्हांकन होगा।
योजना को धरातल पर उतारने के लिए उत्तराखंड राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (USDMA) और शिक्षा विभाग की एक संयुक्त राज्य स्तरीय समिति गठित की जा रही है, जो जिला और ब्लॉक स्तर पर इसकी मॉनिटरिंग करेगी।
छात्रों के नेतृत्व में गठित होंगी 6 विशेष टीमें
इस नई नीति का सबसे अहम पहलू यह है कि आपदा के दौरान की जाने वाली शुरुआती कार्रवाई में विद्यार्थियों को ही मुख्य जिम्मेदारी दी जा रही है। हर विद्यालय में छह विशिष्ट टीमें बनाई जाएंगी:
- चेतावनी एवं सूचना टीम: खतरे की स्थिति में पूरे परिसर में सायरन या अलार्म के जरिए त्वरित अलर्ट जारी करने का काम।
- निकासी (Evacuation) टीम: कमरों से बच्चों को सुरक्षित और बिना भगदड़ के पहले से तय ओपन सेफ असेंबली पॉइंट तक पहुंचाना।
- प्राथमिक उपचार टीम: आपातकाल में फर्स्ट एड किट का इस्तेमाल कर प्राथमिक ड्रेसिंग व मदद देना।
- अग्नि सुरक्षा टीम: अग्निशमन उपकरणों की निगरानी और छोटी आग पर तुरंत नियंत्रण पाना।
- खोज एवं बचाव (Search & Rescue) टीम: भवन के भीतर फंसे किसी बच्चे या स्टाफ को तलाश कर सुरक्षित बाहर निकालना।
- सहायता एवं मनोसामाजिक टीम: आपदा के बाद बच्चों के डर, घबराहट और मानसिक तनाव को दूर करने में सहायता करना।
इन सभी टीमों का नेतृत्व विद्यार्थियों के हाथों में रहेगा, जबकि शिक्षक और कर्मचारी केवल गाइड की भूमिका निभाएंगे। इसका उद्देश्य बच्चों में वास्तविक नेतृत्व क्षमता और आपात स्थिति में घबराने के बजाय त्वरित निर्णय लेने की क्षमता विकसित करना है।
इवैक्यूएशन रूट, दिव्यांगों के लिए विशेष इंतजाम और रियल-टाइम अलर्ट
बैठक में यह स्पष्ट किया गया कि हर स्कूल भवन और क्लासरूम के लिए स्पष्ट निकासी मार्ग (Evacuation Routes) दीवार पर प्रदर्शित किए जाएंगे। दिव्यांग तथा विशेष आवश्यकता वाले विद्यार्थियों (CWSN) के सुरक्षित रेस्क्यू के लिए अलग से बडी-सिस्टम या विशेष केयरटेकर व्यवस्था तय की जाएगी। इसके अलावा स्कूल परिसर में मौजूद बिजली के पैनल, गैस पाइपलाइन, लैब केमिकल्स और पानी की टंकियों का नियमित सेफ्टी ऑडिट अनिवार्य होगा।
आपात स्थिति में अभिभावकों तक तत्काल सूचना पहुंचाने के लिए एक त्वरित संचार व्यवस्था विकसित की जा रही है, ताकि किसी आपदा के समय अफवाहों से बचा जा सके और स्थानीय ग्राम पंचायत व पुलिस-प्रशासन के साथ बेहतर तालमेल बन सके।












